तिमिर-तट पर दीप धर, निज अंतर को आलोकित कर,
मोह-मरीचि के मृगजल से, चित्त-कमल को निर्मल कर।
प्रारब्धों की शिलाओं पर, पुरुषार्थ-स्रोत बहाता चल,
विघ्न-विषमता के विष पीकर, अमृत-चेतना पाता चल।
काल-चक्र की गति में भी, स्वधर्म-सूर्य उगाता चल,
संशय-शैवाल हटाकर, सत्य-सलिल में नहाता चल।
आशा के आकाश तले, संकल्प-सुमन खिलाता चल,
पतन-प्रलय के मध्य स्वयं को, धैर्य-धरा पर साधता चल।
फलासक्ति के पाश काटकर, निष्काम-यज्ञ रचाता चल,
अहंकार के हिमगिरि गलाकर, आत्मप्रभा बरसाता चल।
राग-द्वेष के द्वार बंद कर, समत्व-सुधा बरसाता चल,
सुख-दुःख दोनों को सम मान, चित्त-दीप जलाता चल।
श्रम को शिव की साधना, सेवा को पूजा मानता चल,
अपने श्रम की पुण्याग्नि से, लोक-दीप जलाता चल।
कर्म बने जब ध्यान स्वयं ही, ध्यान बने जब आत्मबल,
श्वास-श्वास में सत्य जगे, अंतःकरण हो निर्मल-जल।
कर्ता-भाव की गाँठ खोलकर, साक्षी-चेतन होता चल,
कर्मपथ से ब्रह्मपथ तक, निज स्वरूप को पाता चल।
-सनातन मुकुंद