झर-झर झरना झरता जाए,
झिलमिल नभ मुसकाए।
झूम-झूमकर झूमे डाली,
झट आई ऋतु मतवाली।
झीनी बूँदें झरती जाएँ,
झंकारें पत्तों पर छाएँ।
झोंका जब वन में लहराए,
झरते फूलों को सहलाए।
झर-झर जीवन-रस बरसाए,
झिलमिल सपनों को मुसकाए।
झंकारों से भर दे मन को,
झूम उठे संसार क्षण-क्षण को।
झिलमिल करती दूब हरी,
झरनों की धुन कितनी प्यारी।
झुकी डाल पर झूले पंछी,
झूम उठे हँसते सब बच्चे।
-सनातन मुकुंद