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झर-झर झूमे जीवन : प्रकृति-प्रधान बालगीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            झर-झर झरना झरता जाए,
        
                                                    
                            
झिलमिल नभ मुसकाए।
झूम-झूमकर झूमे डाली,
झट आई ऋतु मतवाली।

झीनी बूँदें झरती जाएँ,
झंकारें पत्तों पर छाएँ।
झोंका जब वन में लहराए,
झरते फूलों को सहलाए।

झर-झर जीवन-रस बरसाए,
झिलमिल सपनों को मुसकाए।
झंकारों से भर दे मन को,
झूम उठे संसार क्षण-क्षण को।

झिलमिल करती दूब हरी,
झरनों की धुन कितनी प्यारी।
झुकी डाल पर झूले पंछी,
झूम उठे हँसते सब बच्चे।
-सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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