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हिज्र : ग़ज़ल

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कोई लम्हा न मिला दिल को करार हिज्र में,
        
                                                    
                            
उम्र करती रही बस तेरा इंतज़ार हिज्र में।

चाँद निकला, तो अश्कों में डूबा मिला,
रात लिखती रही दर्द का गुबार हिज्र में।

गुल ने ख़ुशबू भी लुटाई तो उदासी महकी,
रुत ने पहना न कभी रंग-ए-बहार हिज्र में।

दिल के वीरान मकाँ में तेरी आहट गूँजी,
जैसे ख़्वाबों में हुआ तेरा दीदार हिज्र में।

इश्क़ की राह में मंज़िल का तअय्युन क्या है,
रूह पाती है अजब-सा इक वकार हिज्र में।

जिसे खोकर कभी दिल से जुदा कर न सके,
वो ही रहता है दुआ का ऐतबार हिज्र में।

वक़्त की गर्द ने चेहरों को बदल डाला मगर,
याद का रहता है वैसा ही निखार हिज्र में।

'मुकुंद' इश्क़ अगर सच्चा हो, फ़ानी कब है;
रूह पाती है फ़क़त इफ़्तिख़ार हिज्र में।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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