अमावस की काली चूनर पर, हरित किरण मुसकाई है,
धरती ने नव पल्लव चुनकर, अपनी सेज सजाई है।
मेघों ने काजल घोल गगन पर, नील कपोल सँवारे हैं,
बूँदों ने मोती बन-बनकर, वन-उपवन सब निखारे हैं।
डाली-डाली पवन झुलाए, पत्तों में मधु-राग जगा,
माटी की सौंधी साँसों में, जीवन का अनुराग जगा।
बीजों में भविष्य सो रहा, अंकुर में संसार नया,
जब धरती में वृक्ष रोपें, जन्मे जैसे प्यार नया।
तम भी आज तपस्या बनकर, हरित प्रभा को जन्म दे,
मौन अमावस अंतस में भी, नवजीवन की चाह दे।
प्रकृति नहीं केवल श्रृंगार, यह जीवन का मूल प्राण,
इसके आँचल में ही पलता, मानवता का नव निर्माण।
आओ इस पावन अवसर पर, वृक्ष-प्रेम का व्रत धरें,
धरती-माता के हरित हृदय में, नवसृजन के बीज भरें।
हरियाली की यह अमावस, संदेश सदा दोहराए—
धरती को जो हरित बनाए, धरती उसको जीवन दे।
- सनातन मुकुंद