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हलधर : कर्मभूमि से अंतःभूमि तक

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हलधर! तेरे हल की रेखा, धरती का श्रृंगार,
        
                                                    
                            
माटी के उर में जागे, जीवन का नव-उद्गार।
श्वेत हिमाचल-सा निर्मल, शेष-फणों-सा धीर,
तेरे स्पर्श से धरा सँवरे, मिटे जगत की पीर॥

नील गगन की छाँह में जब, हल की ध्वनि झंकारे,
सूखे मन के खेतों में भी, आशा-बीज उबारे।
माटी की मुट्ठी में पलता, अन्नमय संसार,
श्रम की स्वर्णिम रेखा लिखता, हलधर बारंबार॥

हल केवल लौह-फाल नहीं, कर्म-ज्योति की धार,
अंतर-क्षेत्र जोतते ही, मिटे मोह-अंधकार।
काम-क्रोध के कंटक-वन जब, मन में जड़ फैलाएँ,
विवेक-हल की तीखी रेखा, मूल सहित कट जाए॥

बल केवल भुजबल नहीं है, धैर्य अपरंपार,
सत्य-धरा पर अडिग खड़ा जो, वही सच्चा आधार।
धरती सब कुछ सहकर भी, देती जीवन-अन्न,
हलधर! तेरी कर्म-साधना, करती जग को धन्य॥

कृष्ण-सखा! धर्म-भूमि के तू, अटल धर्म-प्रहरी,
तेरे हल की हर एक रेखा, कर्म-पंथ की क्यारी।
सद्भावों के बीज उगें जब, निर्मल हों विचार,
मानवता की फसल लहलहे, यही तेरा उपहार॥

हलषष्ठी की पावन बेला, मातृ-आस्था गाए,
अन्न, धरा और संतति का, मंगल दीप जलाए।
माटी-लिपे आँगन में फिर, लोक-स्मृति मुस्काए,
कण-कण में जैसे हलधर के, चरणचिह्न बस जाएँ॥

हे बलदाऊ! अंतस-धरती, फिर उर्वर कर दो,
सूने मन में सत्य-सुधा के, बीज अमर भर दो।
अहंकार की पाषाण-माटी, करुणा से गल जाए,
तेरे हल की एक लकीर से, आत्मप्रभा उग आए॥

जब तक श्रम का सूर्य जलेगा, तब तक अन्न रहेगा,
जब तक धर्म हृदय में जागे, मानव धन्य रहेगा।
हलधर! तेरी महिमा केवल, पुराण-कथा न हो—
हर मन अपनी भूमि जोतकर, स्वयं कृष्णमय हो॥
-सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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