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ज्ञान का पहला दीया : प्रतीकात्मक–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन की बंद गुफा में जब, पहला दीप जला,
        
                                                    
                            
मौन अँधेरे के अधरों पर, उजला अक्षर खिला।
भटकी दिशाओं को जैसे, कोई मार्ग मिला,
जैसे सूनी धरती पर, पहली ओस ढली॥

मुट्ठी भर उस ज्योति ने, तम का मर्म पढ़ा,
एक किरण ने भीतर के, सहस्र द्वार खोले।
शब्द बने जब मंत्र वहाँ, अर्थ हुआ आकाश,
बूँद बनी चेतना और, सागर हुआ प्रकाश॥

गुरु की उँगली थामकर, अक्षर-पथ पर चला,
मिट्टी के उस दीपक में, नभ का सूर्य पला।
जिसे बाहर खोज रहा था, वह भीतर ही मिला,
ज्ञान नहीं केवल सूचना—जीवन का अर्थ खुला॥

प्रश्नों की शुष्क डाल पर, उत्तर-पल्लव फूटे,
संशय के घने कुहासे, स्वबोध-सूर्य से छूटे।
‘मैं’ की छोटी देहरी पर, अनंत खड़ा था मौन,
एक दीप से दीप जले तो, मिट गया भेद-विभाजन॥

अब वह पहला दीपक ही, दीपमाला बनता है,
अपने भीतर का प्रकाश, जग का तम हरता है।
ज्ञान जहाँ विनय बन जाए, वहीं सत्य मुस्काए,
एक दिया जब स्वयं जले—सौ सूरज उग आए॥
-सनातन मुकुंद
22 घंटे पहले
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