गुरु ज्ञान-ज्योति शाश्वत, जीवन-पथ आलोक।
जिनसे जगमग हो उठे, मन-बुद्धि और लोक॥
चरण-रज पावन सुधा, हर ले सकल अज्ञान।
वंदित गुरुवर की कृपा, जीवन का कल्याण॥
सत्य-सुधा से सींचते, श्रद्धा-तरु अविराम।
करुणा-कुसुम सुवासित, पुलकित हर धाम॥
वेद-विभा के दीप बनकर, खोलें ज्ञान-कपाट।
मोह-तिमिर सब क्षीण हो, प्रकटे सत्य-विराट॥
विवेक-वट की छाँह में, शीतल हो मन-प्राण।
सदाचार-सुरसरि बहे, सुरभित हो संसार॥
संयम, सेवा, साधना, जीवन के आधार।
गुरु-कृपा से सिद्ध हो, मानव का संस्कार॥
नत-मस्तक मानव-हृदय, अर्पित तन-मन-प्राण।
गुरु-चरणारविन्द में, पाए जग-जन परम-धाम॥
शत-शत वंदन गुरुवर, ज्ञानस्वरूप महान।
जय-जय सद्गुरुदेव की, गूँजे दिव्य-गुणगान॥
-सनातन मुकुंद