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गुरु-तत्त्व : अंतर्दीप से एक-तत्त्व तक

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तम में दीप जला, अंतस में उजियारा,
        
                                                    
                            
मौन में नाद उठा, चेतन ने पुकारा।
बूँद में सिन्धु मिला, कण में विस्तार,
दृष्टि में दृष्टा मिला, खुला आत्म-द्वार।

बीज में वन, शून्य में स्वर जागा,
देह-दीप में चिरप्रकाश जागा।
शब्द बने सेतु, मौन पारावार,
एक अक्षर में खुला अनंत संसार।

तम को छेदा नहीं, अंतर्दीप जला,
पथ बाहर न मिला, अंतःपथ खुला।
अहं-भार ढला, पथिक पथ बना,
बूँद सिंधु समाई, एक-तत्त्व बना।

ज्ञान आत्मा बना, कर्म बने चंदन,
शिष्य दीप बना, गुरु बना स्पंदन।
भेद जहाँ मिटा, सत्य वहीं प्रकट,
गुरु-तत्त्व वहीं—अखंड, अविरत।
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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