जला के रक़्स-ए-तिश्नगी, मैं आया हूँ सँवरने को,
कि मह्व हुई ज़ुल्मत-ए-शब, चराग़-ए-हक़ जलने को।
तपन ने चाक कर डाली, हर इक शाख़-ए-बदन मेरी,
मगर इक बीज ज़िंदा है, शजर-ए-वहदत उगाने को।
नज़र की ठोकरों से ही, मुझे तौफ़ीक़ हासिल है,
मक़ाम-ए-ला-मकाँ छू लूँ, हद-ए-हस्ती मिटाने को।
उम्क़-ए-सकूत-ए-लब, अयाँ हर राज़ करता है,
निगाहें रूबरू हों जब, कहाँ दरकार कहने को।
नक़ाब-ए-तबस्सुम ओढ़े, वो ज़ख़्मों को छुपाते हैं,
ये रस्म-ए-बशर है बस, दर्द-ए-दिल छुपाने को।
अना के बुत को तोड़ आए, जो कू-ए-यार में ठहरे,
मोहब्बत हाथ में लेकर, नया घर-बार बसाने को।
'मुकुंद' ये साँस तो नेमत, ये ज़ीस्त इक मुसाफ़िर है,
कि रब को नज़र कर दी, उसी की रज़ा पाने को।
- सनातन मुकुंद