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फ़ना-ए-वजूद : तजल्ली-ए-हक़

                
                                                         
                            जला के रक़्स-ए-तिश्नगी, मैं आया हूँ सँवरने को,
                                                                 
                            
कि मह्व हुई ज़ुल्मत-ए-शब, चराग़-ए-हक़ जलने को।

तपन ने चाक कर डाली, हर इक शाख़-ए-बदन मेरी,
मगर इक बीज ज़िंदा है, शजर-ए-वहदत उगाने को।

नज़र की ठोकरों से ही, मुझे तौफ़ीक़ हासिल है,
मक़ाम-ए-ला-मकाँ छू लूँ, हद-ए-हस्ती मिटाने को।

उम्क़-ए-सकूत-ए-लब, अयाँ हर राज़ करता है,
निगाहें रूबरू हों जब, कहाँ दरकार कहने को।

नक़ाब-ए-तबस्सुम ओढ़े, वो ज़ख़्मों को छुपाते हैं,
ये रस्म-ए-बशर है बस, दर्द-ए-दिल छुपाने को।

अना के बुत को तोड़ आए, जो कू-ए-यार में ठहरे,
मोहब्बत हाथ में लेकर, नया घर-बार बसाने को।

'मुकुंद' ये साँस तो नेमत, ये ज़ीस्त इक मुसाफ़िर है,
कि रब को नज़र कर दी, उसी की रज़ा पाने को।
- सनातन मुकुंद
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2 महीने पहले

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