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दीप से दिशा तक : प्रतीकात्मक–दार्शनिक शिक्षक-गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब जीवन की साँझ घिरी थी, पथ पर गहरा तम था,
        
                                                    
                            
दिशा-दिशा धुँधली लगती थी, मन में भी संशय था।
तब कोई दीपक बनकर आया, ज्योति लिए मुस्काया,
शब्द नहीं केवल—उसने, जीने का अर्थ बताया॥

सूने मन की माटी में उसने, स्वप्न-सुमन बोए,
बुझती आँखों के आकाश में, नव नक्षत्र संजोए।
अक्षर-अक्षर दीप बनाकर, चेतन-दीप जलाया,
बाहर जग को पढ़ने से पहले, अपना मन पढ़ाया॥

ठोकर को सीढ़ी कर दी, आँसू को संबल,
हारों के पतझर में बोया, आशा का नव अंकुर।
प्रश्नों की निर्जन राहों पर, खोज-सुमन खिलवाए,
उत्तर देने से पहले हमको, प्रश्न करना सिखलाए॥

कहा—“उड़ना सीखो, नभ की सीमा कहाँ तुम्हारी,
अपने पंखों से लिखनी होगी, अपनी नई कहानी।”
हाथ पकड़कर राह दिखाई, फिर हाथ स्वयं छुड़ाया,
आत्मनिर्भरता का पहला, पाठ हमें पढ़ाया॥

वे दीप बने तो हममें, कितनी ज्योतियाँ जागीं,
उनके दिए संस्कारों से, सूनी राहें जगमगाईं।
वे बीज बने तो हम वन हुए, छाया बनकर छाए,
उनकी निर्मल तप-साधना से, कितने जीवन मुस्काए॥

आज हमारे शब्दों में भी, उनकी ध्वनि रहती है,
हर ऊँचाई के शिखर तले, उनकी नींव कहती है।
हम जो भी हैं, जिस पथ पर हैं, उनकी ही देन है,
शिष्य जहाँ भी प्रकाश बने—गुरु वहीं अमरत्व है॥

दीप से दिशा, दिशा से यात्रा, यात्रा से पहचान,
गुरु से अक्षर, अक्षर से चेतन, चेतन से विज्ञान।
एक दीप की लौ जब बढ़ती, दीप अनेक जलाती,
एक शिक्षक की तपती साधना, पीढ़ी-पीढ़ी जगमगाती॥

कल जब कोई शिष्य किसी के, जीवन में दीप जलाए,
अपने गुरु की दी हुई ज्योति, आगे बढ़ाता जाए।
तब समझो शिक्षा केवल, शब्दों में नहीं समाती—
गुरु की ज्योति शिष्य से होकर, युग-युग तक फैलती जाती॥

और यही गुरु की सच्ची, सबसे सुंदर परिभाषा—
स्वयं दीप बनकर जलना, और जग को देना आशा।
एक दीप से दीप जले तो, तम का अंत सुनिश्चित है,
एक गुरु से युग जाग उठे—शिक्षा की यही शक्ति है॥
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
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