विज्ञापन

दरगुज़र : ग़ज़ल

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी हर इक बात पर उनको हमारा दरगुज़र याद है,
        
                                                    
                            
भूल बैठे हैं वो ख़ताएँ, जिनका उनको भी असर याद है।

हम तो बदले में मोहब्बत ही लुटाते रहे उम्र भर,
वो सितमगर आज भी अपना हर इक नश्तर याद है।

आईना जब भी उठाया, रू-ब-रू बस वो ही चेहरा था,
टूटे दिल के हर ज़र्रे में आज भी वही मंज़र याद है।

जो कहा करते थे, मिटा देंगे तेरी हर एक याद को,
उनको अपनी तन्हाइयों में आज मेरा समंदर याद है।

छोड़ आए 'मुकुंद' जहाँ हम कारवाँ-ए-इश्क़ को,
धूल में लिपटी वही मंज़िल, वही राहगुज़र याद है।
- सनातन मुकुंद
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all