आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दरगुज़र : ग़ज़ल

                
                                                         
                            अपनी हर इक बात पर उनको हमारा दरगुज़र याद है,
                                                                 
                            
भूल बैठे हैं वो ख़ताएँ, जिनका उनको भी असर याद है।

हम तो बदले में मोहब्बत ही लुटाते रहे उम्र भर,
वो सितमगर आज भी अपना हर इक नश्तर याद है।

आईना जब भी उठाया, रू-ब-रू बस वो ही चेहरा था,
टूटे दिल के हर ज़र्रे में आज भी वही मंज़र याद है।

जो कहा करते थे, मिटा देंगे तेरी हर एक याद को,
उनको अपनी तन्हाइयों में आज मेरा समंदर याद है।

छोड़ आए 'मुकुंद' जहाँ हम कारवाँ-ए-इश्क़ को,
धूल में लिपटी वही मंज़िल, वही राहगुज़र याद है।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर