विज्ञापन

बीच में चले नंदलाला, सिर मोर-पंखन की झाल।

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल,
        
                                                    
                            
बीच में चले नंदलाला, सिर मोर-पंखन की झाल।
हँसत-खेलत जाएँ बनवारी, मुरली मधुर बजावैं,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

पीत पगरिया, पीत कछौटा, माथे मोर मुकुट,
कानन कुण्डल झिलमिल चमकैं, अधरन बाँसुरी सोहै।
कजरारे नैनन की चितवन, करती मन बेहाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

आगे-आगे कान्हा डोलें, पीछे ग्वालन की टोली,
कोई बजावे बाँसुरिया, कोई हँसे ठिठोली।
धूर उड़त ब्रज की गलियन में, छवि लागे बेमिसाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

कदंब तले जब कान्हा बैठैं, छेड़ैं मधुर तान,
सुनि पंछी सुधि बिसरावैं, ठहरि जाए यमुना-धार।
मोर नाचैं, कोयल कूजैं, झूमैं डार-डाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

माखन-मटकी देखत कान्हा, नैनन से करैं निहार,
सखा कहैं—“चल छोड़ कन्हैया!” हँसि बोले नंदकुमार।
चुपके हाथ बढ़ाय माखन ले, भागैं नटवरलाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

मैया पूछैं—“कौन चुरायो?” कान्हा बनैं अनजान,
“मैं तो मैया खेलत आयो, माखन खायो कौन?”
कान्हा की मुसकी देख मैया, होइ उठीं निहाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

साँझ पड़े जब गइया लौटैं, बाजैं गइयन के घुँघरू,
धूर भरे मुख पर मुसकान, नैनन में रस भरपूर।
द्वारे खड़ी यशोदा मैया, निहारे नंदलाल,
“आ जा लाला, गोद में आ जा”—भरि आए मैया के नैन॥

ब्रज की रज धन्य भई है, छूकर कान्हा के पाँव,
तेरी मुरली सुनि मुसकावैं, यमुना, वन अरु गाँव।
जिसके हिय में बसैं कन्हैया, उसका जग खुशहाल,
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥

छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल,
बीच में चले नंदलाला, सिर मोर-पंखन की झाल।
हँसत-खेलत जाएँ बनवारी, मुरली मधुर बजावैं,
ब्रज की गलियन गूँज उठीं—जय-जय नंदलाल!
छोट-छोट गइया, छोटे-छोट ग्वाल॥
-सनातन मुकुंद
14 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

26 कविताएं

View Profile

Sudhir Khatri

562 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12570 कविताएं

View Profile