लिख रहा हूँ दर्द का किस्सा दिल के लहू से एक बेटी का
पाला जिसे मां बाप ने नाज़ों से समझकर टुकड़ा एक ज़िगर का
ममता ने पिलाया था जिसे दूध भरपेट अपनी छाती का
फरिश्ता बनकर आई वो जो एक सहारा था बस माँ के जीने का
गुडिया गुड्डो तक खेलना बस बोध था उसको अपने जीवन का
अच्छा प्यारा प्यारा सा एक नाम था घर मेंं खुशी खुशी उसका
दुखी होती थी वो जब कभी दिल रोता था बहुत माँ की ममता का
उसके गम का गिरता एक एक ऑसू माँ की बेचैनी के सौ सौ आसूं पीता था
अंकल अंकल बोल पाती थी वो बस प्यार का सभी से था रिश्ता
ऑखो की प्यारी दुलारी नन्हीं गुडिया बेटा मुंह बोला बन गई सबका
बचपन की मघुर किलकारियों से गूंज उठता था द्यर उपवन जिनका
वही माता पिता कहते बार बार बस यही इकलौता संसार है उनका
ना जाने कब इंसानी भेडिये की उसके बचपन को नज़र खा गई
एक रोज सब कुछ लूट लिया हैवानियत ने प्यारे नन्हें से जीवन का
मम्मी मम्मी चीखती रह गई जिन्दगी उस मासूमम बोध बचपन की
कलेजा फट गया इंसानियत का लहुलुहान निर्वस्त्र शब देख बेटी का
जागो जागृति लाओ जिन्दा करो इंसानियत की आवाज अपनी
फिर कभी पैदा ना हो दूसरा कोई कातिल नारी की अस्मत का
शंकर बुलंदशहरी 8881382349 2219
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