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लिख रहा हूंं दर्द का किस्सा .........

SHANKAR lal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लिख रहा हूँ दर्द का किस्सा दिल के लहू से एक बेटी का
        
                                                    
                            
पाला जिसे मां बाप ने नाज़ों से समझकर टुकड़ा एक ज़िगर का
ममता ने पिलाया था जिसे दूध भरपेट अपनी छाती का
फरिश्ता बनकर आई वो जो एक सहारा था बस माँ के जीने का
गुडिया गुड्डो तक खेलना बस बोध था उसको अपने जीवन का
अच्छा प्यारा प्यारा सा एक नाम था घर मेंं खुशी खुशी उसका
दुखी होती थी वो जब कभी दिल रोता था बहुत माँ की ममता का
उसके गम का गिरता एक एक ऑसू माँ की बेचैनी के सौ सौ आसूं पीता था
अंकल अंकल बोल पाती थी वो बस प्यार का सभी से था रिश्ता
ऑखो की प्यारी दुलारी नन्हीं गुडिया बेटा मुंह बोला बन गई सबका
बचपन की मघुर किलकारियों से गूंज उठता था द्यर उपवन जिनका
वही माता पिता कहते बार बार बस यही इकलौता संसार है उनका
ना जाने कब इंसानी भेडिये की उसके बचपन को नज़र खा गई
एक रोज सब कुछ लूट लिया हैवानियत ने प्यारे नन्हें से जीवन का
मम्मी मम्मी चीखती रह गई जिन्दगी उस मासूमम बोध बचपन की
कलेजा फट गया इंसानियत का लहुलुहान निर्वस्त्र शब देख बेटी का
जागो जागृति लाओ जिन्दा करो इंसानियत की आवाज अपनी
फिर कभी पैदा ना हो दूसरा कोई कातिल नारी की अस्मत का
शंकर बुलंदशहरी 8881382349 2219

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