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"आईना बोलता है"

Shambhu Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भगदड़ ही भगदड़ दीख रहा,
        
                                                    
                            
विपक्षी दलों में हाहाकार है।
पूरे देश में एक ही सरकार है,
क्या आम, क्या खास—
हर कोई सलामी में लगा है।
हर शक्स उचक-उचक कर
अपना चेहरा दिखाने में लगा हैं।

दरबारों में जय-जयकारा है,
छोटा या बड़ा कोई खास,
हर ओर बस "नमो-नमो",
सुबह-शाम, "नमो-नमो"।
कुछ हुआ या नहीं हुआ,
बस मुग़ाम्बो खुश हुआ।

सुन-सुनकर तारीफ़ के तराने,
भूल गए प्रजातंत्र के माने,
ज़मीनी हक़ीक़त के फ़साने।
खुद को समझने लगे
जनता से भी ऊपर,
संविधान से बड़ा,
सबका भाग्य-विधाता,
युग-त्राता, स्वयंभू अवतारी,
सत्ता का एकमात्र अधिकारी।
नॉन-बायोलॉजिकल, दिव्य अवतार,
जैसे ईश्वर ने भेजा हो साकार।

एक दिन एक चित्रकार ने,
ले हाथों में दर्पण चमकाया।
राजा बोला, "लाओ, देखूँ तो,
मैं भी अपनी सुंदर काया।"

ज्यों ही देखा, ठिठका, ठहरा,
सामने आया असली चेहरा।
न रूप दिखा, न शान दिखी,
बस कमियों की खान दिखी।
झूठी वाह-वाहियों के नीचे,
दबी सच्चाई की जान दिखी।
तालियों की ऊँची गूँज में,
लोकतंत्र का अवसान दिखा।

राजा घबराया, क्रोध में आया,
सच का दर्पण वहीं चटकाया।
सोचा—अब न बकवास दिखेगी,
सच्चाई भी यहीं सिमटेगी।

पर दर्पण ने भी गढ़ी कहानी,
टूटकर बन गई नई निशानी।
अब एक नहीं, हजारों चेहरे,
सच के अनगिन दर्पण ठहरे।

एक से ट्रस्टियों का कारनामा फूट रहा था।
चंपत बन राजा, राम लला को लूट रहा था।
एक दर्पण टुकड़ा रियल स्टेट का यंत्री था।
बताया, राजा ही प्रदेश सी-एम, संतरी था।
महाकालेश्वर के नाम पर व्यापार दिखा,
उज्जैन की ज़मीनों का बाज़ार दिखा।।

हर टुकड़ा कुछ न कुछ बोल रहा था,
छुपा हुआ हर सच खोल रहा था।
कोई बंगाल, कोई बिहार,
कोई असम, कोई महाराष्ट्र,
कोई पेपर लीक का राज बता रहा था,
व्यवस्था का असली चेहरा दिखा रहा था।।

एक टुकड़ा यू-एस जा छिटका,
वहाँ ट्रंप उसे झट से लपका।
वहीं से शीशा चमका रहा है,
बंदर बना, मदारी नचा रहा है।

हर टुकड़ा एक आँख बन गया,
हर कोना एक तथ्य कह गया।
राजा भागा—"बचाओ, बचाओ,
इन नज़रों से मुझे हटाओ!"

दौड़े आए चाटुकार बेचारे,
लेकर अपने पुराने नारे।
बोले—"महाराज, चिंता त्यागो,
चौक-चौराहों पर होर्डिंग्स लगवा दो।
जो कोई आईना दिखाएगा,
देशद्रोही कहलाएगा।
जो प्रश्न करे, गद्दार होगा,
सच लिखे, अख़बार जलेगा।

जो सिर झुकाए, वही सयाना,
जो सच बोले, रहे बेगाना।
जय-जयकार ही धर्म बनेगी,
चुप्पी ही अब कर्म बनेगी।"

कुर्सी चाहे जितनी ऊँची कर लो,
लाख सवालों पर पहरे धर दो।
सच पर ताले जड़वा लो,
चारों ओर संतरी बिठवा लो।
लेकिन जनता जाग रही है,
खामोशी को त्याग रही है।
हर टूटे कण से झाँक रही है,
सत्ता की नीयत भाँप रही है।।

इसलिए ऐ सत्ता के रखवालों,
अहंकार के मद में मतवालों,
याद रख लो एक पुरानी बात—
आईना दुश्मन नहीं, बताता है औकात।
जो प्रधान सेवक आईने से डर जाता है,
वह अपनी ही परछाई से हार जाता है।

सब चुप हों, मिडिया मौन हो जाए,
पर आईना सच बोलता है।
सत्ता चाहे जितना दफनाए ले
इतिहास तो कब्र खोलता है।।
-शम्भु प्रसाद
2 महीने पहले
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