जिस दिन मैं अपने जीवन की सच्चाई लिखूँगी,
अकेलेपन को सहारा और भीड़ को गुनहगार लिखूँगी।
दोस्ती के वादों को मैं एक सौदा लिखूँगी,
प्यार के आकर्षण को एक धोखा लिखूँगी।
रिश्तों की हर उलझन को एक कहानी लिखूँगी,
अपनों के बीच छिपे हुए मतलब को लिखूँगी।
बीते हुए कल की यादों को मैं एक दर्द लिखूँगी,
और साथ निभाने के वादों को सिर्फ शब्द लिखूँगी।
टूटे हुए भरोसे के रिश्तों को मैं दरार लिखूँगी,
अपनापन दिखाने वालों को झूठा सहारा लिखूँगी।
झूठी मुस्कान के पीछे छिपे मैं दुख को लिखूँगी,
खामोश होंठों के पीछे की एक आवाज़ लिखूँगी।
जिन आँखों ने नींद खोई, उन रातों का हिसाब लिखूँगी,
हर बार खुद से हारने की मैं वजह लिखूँगी।
जिनके लिए खुद को खोया, उन्हें अपना गुनहगार लिखूँगी,
अपनी चाहत के आगे खुद को मैं मजबूर लिखूँगी।
फिर भी अपनी कलम से झूठ नहीं लिखूँगी,
जिसने जैसा दर्द दिया, उसे वैसा ही लिखूँगी।
आखिरी पन्ने पर अपना अधिकार लिखूँगी,
खुद को फिर से जोड़कर एक नई शुरुआत लिखूँगी।
फिर कलम रख दूँगी और पूरा हिसाब लिखूँगी,
सबको पढ़ चुकी हूँ, अब खुद को समझना लिखूँगी
-संजू मौर्या