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एक भोला सा लड़का

Shalini Bhatt

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनायास ही मन में आया , लिखूं कुछ ज़िंदगी पर ,
        
                                                    
                            
नज़रें दौड़ी और रुक गई ख़ुद की ज़िंदगी पर.
जो एक टक हमारी ज़िंदगी संवारने लगी थी.
एक भोला सा लड़का जिसका भोलापन आज और भाया था.
जो कभी मेरे लिए एक फूल ना लाया था,
लेकिन खाने का एक निवाला उसे मेरे बिना कभी न भाया था,
करवा चौथ का व्रत मेरे लिए कुछ ना लाया था,
पर दिन भर पानी न पी कर उसने मेरा साथ जरूर निभाया था.
यह सच है कि बेटी में जान बसती है उसकी,
पर मैंने ख़ुद को उस में हमेशा ख़ुद से ज्यादा पाया था,
आज वह भोला से लड़का मुझे कुछ और भाया था.
ख़ुद के रिश्ते पूरी शिद्दत से निभाता है वह,
और मेरे अपनों को अपना बनाकर ,
मेरा मान उसने सदा बढ़ाया था.
आज वह भोला से लड़का मुझे कुछ और भाया था,
यह सच है कि लड़की अपने सास-ससुर में ,
अपने माता पिता को ढूंढती है,
उसने ख़ुद को मेरे माता-पिता का बेटा बनाया था,
आज वह भोला सा लड़का मुझे कुछ और भाया था.
कृष्ण जैसा सलोना न था,
पर उसमे हमेशा मैंने राम को पाया था.
अपनी बातें कभी नहीं थोपी उसने मुझ पर,
और मेरे बचपने को उसने बहुत सरहाया था.
आज वह भोला सा लड़का मुझे कुछ और भाया था.
तारीफ़ न की थी उसने मेरी कभी,
उसकी आंखों में मैंने हमेशा ख़ुद को ही पाया था.
यह सोचकर मन ख़ुद पर इतराया था ,


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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