तुम्हारा न होना
हाँ, मैं चुप हूँ।
अब मैं दो कप चाय नहीं बनाती,
सुबह का अख़बार भी यूँ ही पड़ा रहता है।
नहीं खुलता कोई पन्ना,
नहीं होती कोई बात—
आज मौसम कैसा है।
हाँ, मैं चुप हूँ।
अब कहीं से नहीं आती
तुम्हारी खाँसी की आवाज़,
गले की वो घरघराहट,
न सुनाई देते हैं
रात के खर्राटों के सुर।
सब कुछ शांत है।
वो सोफा चुप है,
वो कुर्सी चुप है,
टीवी भी चुप है,
और अकेले कमरे में बैठी
मैं भी चुप हूँ।
तुम्हारा न होना
कितना कठिन है।
सुबह चाय बनती है—
पहले दो कप बनते थे,
अब एक ही बनती है।
फिर भी कभी-कभी
हाथ अनजाने में
दो कप निकाल लेते हैं।
एक कप चाय पी जाती है,
दूसरा यूँ ही ठंडा होता रहता है।
शायद चाय की आदत नहीं गई,
बस तुम्हारे साथ
सुबह बिताने की आदत नहीं गई।
तुम्हारा न होना कितना कठिन है—
यह हर सुबह
एक कप चाय
मुझसे कह जाती है।