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खत में बोहोत कुछ लिखा था

Shakti

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कल रात पुरानी किताबों के ढेर को उलटते-पलटते अचानक एक ख़त मिल गया।
        
                                                    
                            

पता नहीं कितने साल पुराना था वो ख़त…
काग़ज़ पीला पड़ चुका था, कुछ शब्द धुंधले हो गए थे, लेकिन भावनाएँ आज भी उतनी ही साफ़ थीं।

ख़त में बहुत कुछ लिखा था—
बहुत सारे सपने,
बहुत सारा प्यार,
भविष्य की छोटी-बड़ी योजनाएँ,
कुछ शिकायतें,
कुछ उम्मीदें
और वो सारी बातें, जिन्हें उस वक़्त कह देना कितना ज़रूरी लगता था।

पढ़ते-पढ़ते कई बार मैं मुस्कुरा दी।
कुछ जगह रुक गई…
और कुछ शब्दों पर जाने क्यों आँखें भर आईं।

अजीब बात है ना,
वक़्त बीत जाता है, लोग बदल जाते हैं, ज़िंदगी किसी और रास्ते पर निकल जाती है…
लेकिन कुछ शब्द वहीं रह जाते हैं, बिल्कुल वैसे ही।

उस ख़त में मुझे अपनी ही एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी—
वो मैं, जो बहुत कुछ मानती थी,
बहुत कुछ चाहती थी,
जिसे लगता था कि कुछ रिश्ते हमेशा ऐसे ही रहेंगे
और कुछ सपने कभी नहीं टूटेंगे।

ख़त पढ़ते हुए लगा जैसे मैं अपने अतीत से मिल रही हूँ।
कुछ यादें जानी-पहचानी थीं,
कुछ बिल्कुल अनजानी लग रही थीं…
और कुछ ऐसी थीं जिन्हें शायद मैं भूल चुकी थी, लेकिन मेरा दिल अब भी उन्हें पहचानता था।

बहुत देर तक वो ख़त मेरे हाथ में रहा।

फिर मैंने उसे धीरे से मोड़ा
और वापस उसी पुरानी किताब के बीच रख दिया।

शायद इसलिए नहीं कि मैं उसे भूलना चाहती हूँ…
बल्कि इसलिए कि अब मैं समझती हूँ—
हर ख़त का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता,
हर सपना पूरा होना ज़रूरी नहीं होता
और हर प्यार का साथ में बदल जाना भी ज़रूरी नहीं होता।

कुछ चीज़ें बस हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बनकर आती हैं…
हमें थोड़ा बदलती हैं,
कुछ सिखाती हैं
और फिर चुपचाप पीछे छूट जाती हैं।

लेकिन कभी-कभी,
पुरानी किताबों के बीच पड़ा एक ख़त
हमें याद दिला देता है
कि हम कभी कितनी शिद्दत से
किसी चीज़ को अपना मानते थे।
5 घंटे पहले
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