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जब अपना ही शहर अनजान हो गया।

Shakeel Jay

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैंने सारे ख़्वाब बेच दिए,
        
                                                    
                            
वो ख़रीददार हो गया।

मैं मरकर भी ज़मीन न पा सका,
वो बैठे-बिठाए ज़मींदार हो गया।

मैंने उम्र गुज़ार दी अपना मुक़द्दर बनाने में,
वो एक दिन में ही मेरी मेहनत का हक़दार हो गया।

जिसके हिस्से में कभी कुछ भी नहीं था,
वक़्त बदला तो वो मालदार हो गया।

मैंने चाहा था कि सबके साथ रहूँ,
मेरा अपना ही मुझसे बेज़ार हो गया।

मेरी मेहनत का हिसाब कौन देता,
हर पसीना जैसे बेकार हो गया।

मैंने आँखों में सजाए थे जो सपने,
हर सपना वक़्त का शिकार हो गया।

न कोई पूछता है हाल मेरा,
मैं ज़िंदा हूँ, मगर लाचार हो गया।

समीर किससे अपने दर्द का शिकवा करूँ,
जब अपना ही शहर अनजान हो गया।

 
4 घंटे पहले
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