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कविता : स्वीकार करो उपहार प्रिए

shailendra sharma

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                            भावुक हृदय के क्रंदन को
        
                                                    
                            
प्रेम अश्रु की स्याही से
गुंथकर तुमको भेज रहा हूं
मैं शब्दों का हार प्रिए

स्वीकार करो उपहार प्रिए

तुम स्मृति की चेतनता हो
भावों की भावुकता हो
विरह के चुभते कांटों में
पुष्पों की कोमलता हो
हृदय में ऐसे दीप्तिमान हो
ज्यों पूरनमासी त्यौहार प्रिए

स्वीकार करो उपहार प्रिए

काले घने मेघ के जैसे
तुम मन में छा जाती हो
चुपके से मादक बयार
बनकर तुम आ जाती हो
सावन की बरखा हो तुम
और बूंदों का श्रृंगार प्रिए

स्वीकार करो उपहार प्रिए

तुम जो हमसे रूठ गए हो
मन में एक व्याकुलता है
प्रेम दक्षता है संभव न हो
पर अन्तस में निश्छलता है
क्षमा योग्य यदि बात मेरी हो
मांगू बन याची बारंबार प्रिए

स्वीकार करो उपहार प्रिए
स्वीकार करो उपहार प्रिए।।
एक महीने पहले
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