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एक दौड़ क्यूँ है जिसमें ज़िंदगी पिछड़ रही है

Shailendra Pal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दौड़ क्यूँ है जिसमें ज़िंदगी पिछड़ रही है
        
                                                    
                            
कमाई बढ़ रही है लेकिन ख़ुशी सिकुड़ रही है

उफ़नते हुए सपनों का कातिल भी मैं ही हूं
मेरी ही रूह की लाश, दफ़्तर में सड़ रही है

दोस्तों ने क्या छोड़ दी मिलने की कवायदें
लगता है जैसे जिस्म से जवानी बिछड़ रही है

बिगड़े हुए घर को बनाने को करे नौकरी
और बाप को लगता है बेटी बिगड़ रही है

'शैल’अपनी ही ख़ामोशी से पूछता है ये सवाल
किसे ख़बर कि ज़िंदगी किस मोड़ मुड़ रही है
एक महीने पहले
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