शिकायत
दरअसल, शिकायत
किसी अधूरी इच्छा
का शोर नहीं
विश्वास की
आखिरी आवाज है
हर किसी से
नहीं की जाती
शिकायत
शिकायतों को भी
उम्मीद होती है
सुने जाने की
कभी समाज से
कभी व्यवस्था से
तो कभी ईश्वर से
मनुष्य माँगता है
हिसाब और बही
उसके हिस्से का न्याय
मगर हर आवाज
हाकिम तक
नहीं पहुँचती
कुछ दरवाजों पर
दम तोड़ देती हैं
कुछ फैसले से पहले ही
मंसूख कर दी जाती हैं
इस दुनिया में
न्याय से पहले
शिकायतकर्ता की
पात्रता देखी जाती है
जब मनुष्य
शिकायत करना
छोड़ देता है
तब समझना
उसकी समस्या
का समाधान
नहीं हुआ
उसके भीतर की
उम्मीद ने
दम तोड़ दिया है।
सबसे बड़ा
अन्याय यही है
मनुष्य से उसका
शिकायत करने
का अधिकार
छिन जाना
या
छीन लिया जाना !