ख़्वाबों में कमाई हुई दौलत थी वो,
हक़ीक़त नहीं महज़ हसरत थी वो।
खुलते ही आँख रेज़ा-रेज़ा हो गई,
कभी पूरी न हो ऐसी मन्नत थी वो।
हक़ीक़त कहिए या ख़ाम-ख़याली,
शायद मेरी पहली मोहब्बत थी वो।
सच पूछो तो तसव्वुर में तामीर हुई,
एक आलीशान सी इमारत थी वो।
जहाँ की चमक में बीनाई खो चुकी,
बे-नूर आँखों की बसारत थी वो।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "