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अब वो मोहब्बत नहीं रही

Shailendra Bhatnagar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब वो दिल नहीं रहा वो मोहब्बत नहीं रही,
        
                                                    
                            
इज़्तिराब नहीं रहा कोई शिकायत नहीं रही।

मुतमइन हुए तर्क-ए-त'आल्लुक के  ब'आद,
अब दिल खोल के  रोने की आदत नहीं रही।

मुस्तक़िल ख़ामोशी सी पसर गई है ज़ेहन में,
दिलों के दरम्याँ हर्फ़-ओ-हिकायत नहीं रही।

दो रोज़ में उल्फ़त का वो आलम गुज़र गया,
रस्म-ओ-राह में पहले सी रफ़ाक़त नहीं रही।

वीराँ बयाबान में बदल गया गुलशन-ए-दिल,
मुरझाए  गुलों में अब वो नज़ाकत नहीं रही।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
एक महीने पहले
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