आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब वो मोहब्बत नहीं रही

                
                                                         
                            अब वो दिल नहीं रहा वो मोहब्बत नहीं रही,
                                                                 
                            
इज़्तिराब नहीं रहा कोई शिकायत नहीं रही।

मुतमइन हुए तर्क-ए-त'आल्लुक के  ब'आद,
अब दिल खोल के  रोने की आदत नहीं रही।

मुस्तक़िल ख़ामोशी सी पसर गई है ज़ेहन में,
दिलों के दरम्याँ हर्फ़-ओ-हिकायत नहीं रही।

दो रोज़ में उल्फ़त का वो आलम गुज़र गया,
रस्म-ओ-राह में पहले सी रफ़ाक़त नहीं रही।

वीराँ बयाबान में बदल गया गुलशन-ए-दिल,
मुरझाए  गुलों में अब वो नज़ाकत नहीं रही।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर