अब वो दिल नहीं रहा वो मोहब्बत नहीं रही,
इज़्तिराब नहीं रहा कोई शिकायत नहीं रही।
मुतमइन हुए तर्क-ए-त'आल्लुक के ब'आद,
अब दिल खोल के रोने की आदत नहीं रही।
मुस्तक़िल ख़ामोशी सी पसर गई है ज़ेहन में,
दिलों के दरम्याँ हर्फ़-ओ-हिकायत नहीं रही।
दो रोज़ में उल्फ़त का वो आलम गुज़र गया,
रस्म-ओ-राह में पहले सी रफ़ाक़त नहीं रही।
वीराँ बयाबान में बदल गया गुलशन-ए-दिल,
मुरझाए गुलों में अब वो नज़ाकत नहीं रही।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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