हम बेवफ़ा नहीं तक़दीर के मारे हैं
मुहब्बत की गलियों में अपना दिल हारे हैं।
छोड़ के फ़लक को आता है हर शब
हम आसमां के वो टूटे सितारे हैं।
बर्बादी का वो मेरी जश्न मना रहे हैं
दोस्त मेरे देखो कितने प्यारे हैं।
कभी हवा भी देती थी पैग़ाम उनका
फिज़ाओं में अब बेवफाई के शरारे हैं।
चांद -चकोरी सा था साथ अपना
मुहब्बत अपनी अब नदियों के किनारे हैं।
वफ़ाओ के क़िस्से गुनगुनाती है दुनिया
यारों इन्हीं में कुछ अफ़साने हमारे हैं।
वफाओं से तेरी चहकता था आशियाना
देख तू आके बस खामोश दीवारें हैं।
मौत का मेरी उनको ग़म नहीं शाहिद
उनके अंजुमन में तो महकती बहारे हैं।
-अश्क़ फ़तेहपुरी