कृष्ण की दीवानी
तोहरे दर्शन को मेरे कान्हा , नयन मोरे तरस गए,
बैठी कब से द्वार तोहरे,नयन मोरे बरस गए।।
कृष्ण की दीवानी बन नाचूँ , गाऊँ, इठलाऊँ,
गीतामृत महोदधी तुम्हारे ही मैं गुण गाऊँ।
प्रीत की लगन लगी मन में, पार्थसारथी सुन लो बात,
करो चमत्कार बंसी का, नयन मोरे तरस गए।
तुम हो अंतरयामी, समझो पीड़ा हृदय की,
युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे तुम हो स्वामी सर्वग्रहरुपी।
विचलित मन कर दो दृढ़, मस्तक मोर मुकुट है शोभित,
भक्ति भाव से सुन लो विनती, नयन मोरे तरस गए।।
बाँसुरी रहती संग तुम्हारे, भीष्ममुक्ति प्रदायक तुम,
सर्वग्रहरुपी हो कान्हा जी जिसमें हो गई मैं गुम।
लीला तोहरी न्यारी, जैसे अंधकार में हो लाली।
सही दिशा का ज्ञान कराओ, नयन मोरे बरस गए।।
भादों का महीना, अष्टमी की रात कान्हा जी,
दर्शनाभिलाषी मेरा जीवन, विश्वरूपप्रदर्शक जी।
कुछ नहीं भाता मन को मेरे, जीवन हो गया कठिन,
समझो मन मस्तिष्क की पीड़ा नयन मोरे तरस गए।।
देवकी नंदन पुत्र, धन्य है माता यशोदा,
मीरा के गिरधर गोपाल, बंसी दयानिधि की और धुन है राधा।
वसुदेवात्मज, सनातन, द्वारकानायक , श्रीशाय स्वामी,
अस्तित्व बिन तुम्हारे कुछ नहीं, नयन मोरे बरस गए।।