सच क्यों लिख देते हो
डंका बजने लगता है
भूख सुलगने लगती है
चर्चा हो ने लगता है
हाथ दुआ को उठते हैं
ज़ेहन सुलगने लगता है
आंखों में इक आंसू ले
दिल भी बुझने लगता है
जाने कितने लफ़्ज़ों में
ये प्रश्न खड़े हो जाते। हैं
ताक़त जिसको मिलती है
भगवान वो क्यों बन जाते हैं
आबाद उजड़ने लगते हैं
शमशान जो भरने लगते हैं
इंसान मुहाफ़िज़ मर जाते हैं
शैत्वान उतरने लगते हैं
आबाद उजड़ने लगते हैं
श्मशान जो भरने लगते
इंसाफ़ है ये या ज़ुल्म है ये
मैं रखूं भला किस ख़ाने में
ग़ुस्ताख़ी ना कर बैठूं मैं
किसी मुफ़लिस की अनजाने में
बस बात यही मैं कहता हूं
अज्ञान नहीं मैं सहता हूं
जब जब तुम उसे पुकारोगे
वो निश्चित ही आ जाएगा
कभी कोड़ों से कभी फुसलाकर
वो सच ही तुम्हें बतायेगा
तुम राह उसी की चुन लेना
और अमर सफर पूरा करना
बस याद रहे ये याद रहे
सदा अग्र ध्वजा रखना
सच की सटीक परिपाटी पर
जीत अलंकृत होती है
मन मन्दिर बन जाता है जब
वो ईद अलौकिक होती। है।
- शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
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