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सच क्यों लिख देते हो

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच क्यों लिख देते हो
        
                                                    
                            
डंका बजने लगता है

भूख सुलगने लगती है
चर्चा हो ने लगता है

हाथ दुआ को उठते हैं
ज़ेहन सुलगने लगता है

आंखों में इक आंसू ले
दिल भी बुझने लगता है

जाने कितने लफ़्ज़ों में
ये प्रश्न खड़े हो जाते। हैं

ताक़त जिसको मिलती है
भगवान वो क्यों बन जाते हैं

आबाद उजड़ने लगते हैं
शमशान जो भरने लगते हैं

इंसान मुहाफ़िज़ मर जाते हैं
शैत्वान उतरने लगते हैं

आबाद उजड़ने लगते हैं
श्मशान जो भरने लगते

इंसाफ़ है ये या ज़ुल्म है ये
मैं रखूं भला किस ख़ाने में

ग़ुस्ताख़ी ना कर बैठूं मैं
किसी मुफ़लिस की अनजाने में

बस बात यही मैं कहता हूं
अज्ञान नहीं मैं सहता हूं

जब जब तुम उसे पुकारोगे
वो निश्चित ही आ जाएगा

कभी कोड़ों से कभी फुसलाकर
वो सच ही तुम्हें बतायेगा

तुम राह उसी की चुन लेना
और अमर सफर पूरा करना

बस याद रहे ये याद रहे
सदा अग्र ध्वजा रखना

सच की सटीक परिपाटी पर
जीत अलंकृत होती है

मन मन्दिर बन जाता है जब
वो ईद अलौकिक होती। है।


- शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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