जज़्ब ए इश़्क़ पे हर गिज़ न यकीं है मुझको
तुम को पालूं तो मोहब्बत पे यक़ीं आ जाए
यूं तो हैं चांद सितारे भी मगर दूर बहुत
तुम को छू लूं तो मोहब्बत पे यक़ी आ जाए
मेरे जज़्बात मेरी रूह को अपनाओ तुम
तुम को जज़्बात सा चाहूं तो यकीं आ जाए
तेरी तस्वीर तेरा अक्स हो ये नामुमकिन
अक़्स मेरा जो बनो तुम तो यक़ीं आ जाए
दिल का हर ज़ख़्म पुकारे है या मरहम मरहम
मरहमे दिल तुम्हीं बन जाओ यक़ीं आ जाए
यूं तो हर दौर ही गुज़रा है तसव्वुर में तिरे
अब हक़ीक़त में चले आओ यक़ी आ जाए
शाह के गीत तुम्हारे हैं तुम्हारी बातें
तुम इन्हें दिल से सराहो तो यक़ीं आ जाए
शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
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