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ग़ज़ल

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देखना फिर एक दिन ये मोजज़ा हो जायेगा
        
                                                    
                            
रास्तों का ना ख़ुदा ही फिर ख़ुदा हो जाएगा

मस्लेहत के रंग अक्सर यूं बदलते हैं मिज़ाज
रहज़नों का क़ाफ़िला ही रहनुमा हो जाएगा

मुस्कुरा दो मुस्कुराना ही फ़क़त है इक इलाज
ज़िन्दगी उम्मीद है ये आसरा हो जाएगा

तुम जलाओ तो सही एक राह में रोशन च़राग़
रोशनी को देखकर फिर क़ाफ़िला हो जाएगा
-शहाब उद्दीन शाह 
3 वर्ष पहले
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