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बाग़ की ख़ुश़्बू

Shahabuddin Shahabuddin

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                            हवाओं में महकती है के जैसे बाग़ की ख़ुश्बू
        
                                                    
                            
मेरी सांसों में महके है वतन की ख़ाक की ख़ुश्बू

जबीं सजदा भी करती है ज़मीं से आसमां को जब
जबीं मेरी चमकती है लगाकर ख़ाक की ख़ुश्बू

ख़ुदा की बारगाहों में ये दोनों हाथ उठते हैं
दुआ बनके गुमकती है ये दोंनों हाथ की ख़ुश्बू

शहीदों के लहु में भी बहुत सा रंग मेरा है
लहु में भी महकती है नियाज़े ख़ाक की ख़ुश्बू

क़िताबों से मोहब्बत है उसूलों का मैं पाबन्दा
मिरे किरदार से महके उन्हीं औवराक की ख़ुश्बू

हर इक रेज़ा महकता है अहद बनकर जवां है शाह
रगे दिल में महकती है बहुश्ते ख़ाक की ख़ुश्बू

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
 
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4 वर्ष पहले
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