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जो समेटा है ख़ाक से

shafaque rauf

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी पूछा है उस तन्हा शजर (माँ) से,
        
                                                    
                            
जिसने धूप-आँधी में अपने पत्तों को पाला है?
कभी देखा है उस बे-साए यतीम की आँखों में,
जिसने वालिदैन (माता-पिता) के साए की कमी को मुसलसल जिया है?
हम तन्हा आए हैं, तन्हा ही जाएँगे,
न कुछ लाए थे, न कुछ लेकर जाएँगे।
जो समेटा है ख़ाक से, वो ख़ाक में ही छोड़ जाएँगे।
अजीब है यह इंसानी फ़ितरत भी,
वक़्त का तईयुन (सीमा) मालूम नहीं,
फिर भी महफ़िलें सजाए बैठा है।

कहने को तो यह दुनिया महज़ एक सराब (धोखा) है,
पर कौन सी शय है जो इंसान को पत्थर बना देती है,
और कौन सी मोम, जो पत्थर को फिर से इंसान कर दे?
हम फिर भी भाग रहे हैं,
ज़िंदगी भर उस साए के पीछे,
जो कभी हमारा था ही नहीं...!

- शफ़क़ रऊफ
4 घंटे पहले
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