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जो समेटा है ख़ाक से

                
                                                         
                            कभी पूछा है उस तन्हा शजर (माँ) से,
                                                                 
                            
जिसने धूप-आँधी में अपने पत्तों को पाला है?
कभी देखा है उस बे-साए यतीम की आँखों में,
जिसने वालिदैन (माता-पिता) के साए की कमी को मुसलसल जिया है?
हम तन्हा आए हैं, तन्हा ही जाएँगे,
न कुछ लाए थे, न कुछ लेकर जाएँगे।
जो समेटा है ख़ाक से, वो ख़ाक में ही छोड़ जाएँगे।
अजीब है यह इंसानी फ़ितरत भी,
वक़्त का तईयुन (सीमा) मालूम नहीं,
फिर भी महफ़िलें सजाए बैठा है।

कहने को तो यह दुनिया महज़ एक सराब (धोखा) है,
पर कौन सी शय है जो इंसान को पत्थर बना देती है,
और कौन सी मोम, जो पत्थर को फिर से इंसान कर दे?
हम फिर भी भाग रहे हैं,
ज़िंदगी भर उस साए के पीछे,
जो कभी हमारा था ही नहीं...!

- शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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