चिराग़-ए-रास्ता बनकर जो अपनी उँगलियाँ दीं थीं
,उसी के बदले दुनिया ने हमें ये तल्ख़ियाँ दीं थीं।
वो भोला सा यक़ीं मेरा, दुआओं की वो ख़ुशबू थी,
मगर बदले में दुनिया ने लहू की हिचकियाँ दीं थीं।
भरोसा काँच का बर्तन, जो टूटा फिर नहीं जुड़ता,
ज़माने ने हमारे सब्र की वो इम्तेहां। ली थीं।
समझ आया कि इस मेले में ख़ुद का हाथ थामें हम,
कि गैरों ने तो बस हमको यहाँ तन्हाइयाँ दीं थीं।
उन्हें हम माफ़ कर देंगे, मगर अब दिल न खोलेंगे,
अपनी हिफाज़त की ख़ातिर ही ये दूरियाँ की थीं।
- शफ़क़ रऊफ