आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चिराग़-ए-रास्ता बनकर

                
                                                         
                            चिराग़-ए-रास्ता बनकर जो अपनी उँगलियाँ दीं थीं
                                                                 
                            
,उसी के बदले दुनिया ने हमें ये तल्ख़ियाँ दीं थीं।

वो भोला सा यक़ीं मेरा, दुआओं की वो ख़ुशबू थी,
मगर बदले में दुनिया ने लहू की हिचकियाँ दीं थीं।

भरोसा काँच का बर्तन, जो टूटा फिर नहीं जुड़ता,
ज़माने ने हमारे सब्र की वो इम्तेहां। ली थीं।


समझ आया कि इस मेले में ख़ुद का हाथ थामें हम,
कि गैरों ने तो बस हमको यहाँ तन्हाइयाँ दीं थीं।

उन्हें हम माफ़ कर देंगे, मगर अब दिल न खोलेंगे,
अपनी हिफाज़त की ख़ातिर ही ये दूरियाँ की थीं।
- शफ़क़ रऊफ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर