38 के बाद का प्यार
38के बाद का प्यार,
शोर नहीं करता…
ख़ामोश रहकर भी
दिल की हर बात समझ लेता है।
न रोज़ मिलने की ज़िद,
न हर बात का हिसाब,
बस दिल से एक दुआ होती है—
तुम जहाँ रहो, मुस्कुराते रहो।
38 के बाद का प्यार,
चेहरे की खूबसूरती से नहीं,
ज़िंदगी से थके हुए
दिल की ख़ामोशी से मोहब्बत करता है।
इस उम्र में
“आई लव यू” से ज़्यादा,
“अपना ख़याल रखना”
दिल को छू जाता है।
न सपनों की कोई भीड़ होती है,
न वादों का कोई बोझ,
बस हाथ थामकर
कुछ दूर साथ चलने की चाहत होती है।
38के बाद का प्यार…
किस्मत से नहीं,
समझ और सुकून से मिलता है।
और जब कोई ऐसा मिल जाए,
तो उसे पाने से ज़्यादा,
उसे उम्रभर संभालकर रखना ज़रूरी होता है।