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जला सके जो अहंकार अपना

Savitri Swami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज के मानव की तुलना,
        
                                                    
                            
होती ना उस रावण से भी।
बनकर राम जला रहा पुतला,
जब बैठ रावण उसमें भी।।

काम करे जा रावण जैसे,
मंदिर राम के जाता है।
पाकर अपने कर्मों का फल,
मर्जी राम की बताता है।।

मन में बैठा रावण है,
तन को राम दिखा रहा।
अनंत कामना लेकर मन में,
मुक्ति की इच्छा जता रहा।।

पुरुष भी तो राम नहीं,
नारी कहां से सीता होगी।
छोड़ सके ना अहंकार दोनों,
घर में कहां से गीता होगी।।

काम क्रोध मद लोभ में,
डूब चुका है आज का मानव।
खुद में राम बताने वाला,
बन गया है स्वयं दानव।।

जलाकर पुतला रावण का,
विजय घोषणा करता है।
बोलकर नित नया झूठ,
सत्य की आहट से डरता है।।

भ्रष्टाचार में डूब कर भी,
कहता खुद को ईमानदार।
विभीषण को बुरा बताने वाला,
बना खुद भाई, भाई का गद्दार।।

विभीषण तो फिर भी खड़ा था,
सत्य और श्री राम के साथ।
आज का मानव होता खड़ा क्यों,
झूठ और अहंकार के साथ।।

रावण का पुतला जलाने से,
कोई राम नहीं हो जाता है।
जला सके जो अहंकार अपना,
मुक्त वही हो पता है।।
-सावित्री स्वामी 
8 घंटे पहले
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