प्रेम के धागे को पंक्तियों में पिरोना भाता है,
चार शब्दों में इसका मर्म, बयाँ कहाँ हो पाता है।
असल प्रेम को मापना हो,
तो उठो, नदी-गिरिवर को नापो,
सामर्थ्य हो तो फिर जाकर तुम,
अगाध सिंधु की गहराई को नापो।
यदि इस कौतुक में भी जीत जाओ,
तो माँ के आँचल में झाँककर देखो,
प्रेम का शाश्वत अर्थ समझना हो,
तो माँ की ममता को आँककर देखो।
यदि प्रेम-तत्त्व को जान जाओगे,
तो जीवन का मोल समझ जाओगे,
सच्चिदानंद की अनुपम भक्ति में,
फिर निज मन को लगा पाओगे।
क्या प्रेम का अर्थ मात्र पाना है?
क्या जीवन भर साथ निभाना है?
संशय हो तो फिर राघव से पूछो,
योगेश्वर कृष्ण और मीरा से पूछो।
यदि अनुराग में स्वार्थ भरा हो,
तो पावन प्रेम को जान न पाओगे,
इस नश्वर जीवन का मोल न समझोगे,
तो इसे भी सफल बना न पाओगे।
निस्वार्थ भाव को परखना हो,
तो मूक पर्वतों से पूछो ज़रा,
अविरल जल और औषधियाँ देकर,
जो बदले में कुछ भी नहीं माँगते।
जब प्रेम ने और विस्तार किया,
तरुवर का विस्तृत रूप लिया,
प्राणवायु देकर इस अवनि को,
अपना सर्वस्व ही दान किया।
फिर प्रेम और व्यापक, गूढ़ बना,
माता-पिता का रूप धरा,
जिन्होंने हमको जीवनदान दिया,
बदले में तनिक भी कुछ न माँगा।
जब-जब सृष्टि में अनुराग बढ़ा,
उसने न जाने कितने रूप धरे,
कभी संगिनी, कभी सहचर बनकर,
इस जग में अनुपम रंग भरे।
अब प्रेम का सत्य दिखलाता हूँ,
इसके अलौकिक स्वरूप को समझाता हूँ,
केवल एक अंश हृदय में धरकर ही,
मन को अंतस तक पुलकित पाता हूँ।
प्रेम को शब्दों की सीमा में
कोई कभी न बाँध सका,
इसके विराट स्वरूप को
कोई कभी न जान सका।
यह तो पूर्ण ब्रह्म का प्रतिरूप है,
जिसके विस्तार का न कोई अंत है।
धरती से गगन को चूमकर,
जग में प्रेम का प्रकाश अनंत है;
वर्षों प्रेम की गाथा गाकर,
फिर भी इसका मर्म कहाँ कह पाएँगे।