जो जेठ की दुपहरी में
शीतल छाँव बन जाते हैं,
पूस की सर्द रातों में
अलाव बन हमारी कंपकंपी चुराते हैं,
सावन की घनघोर बारिश में संबल बन,
हमें हर मुश्किल से बचाते हैं।
पिता वह वृक्ष हैं,
जो हर मौसम में हमारी ढाल बन जाते हैं।
याँ देते हैं,
वे ख़ुद पारस का पत्थर बन हमें स्वर्ण बनाते हैं।
ख़ुद कठिनाइयों से लड़कर भी
हमें सुखी बनाते हैं।
न जेठ की तपिश देखते, न पूस की रात,
दिन-रात कठिन परिश्रम से हमें सफल बनाते हैं।
पिता वह मित्र हैं,
जो हर सुख-दुःख में साथ निभाते हैं।
जो अज्ञान का अंधकार मिटाकर
ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
सही-गलत की पहचान कराकर,
हमें कर्तव्य-पथ दिखाते हैं।
जग के छल-प्रपंच समझाकर,
उत्तम राह दिखाते हैं।
पिता वह आदि गुरु हैं,
जो उत्तम राह दिखाते हैं।
जो ख़ुद भूखे रहकर भी
हमारी भूख मिटाते हैं।
हमें नवीन वस्त्र दिलाकर
ख़ुद जीर्ण वसन अपनाते हैं।
ऊपर से कठोर आवरण बनकर,
अविरल स्नेह छुपाते हैं।
पिता वह त्याग की मूरत हैं,
जो घर को स्वर्ग बनाते हैं।
जो मेरे जीवन की नैया को
कपट रूपी समंदर से पार लगाते हैं।
मेरे मार्ग से भटक जाने पर,
वे नवीन मार्ग दिखाते हैं।
अपने जीवन के अनुभवों से,
मेरा जीवन-पथ सहज बनाते हैं।
पिता वह पतवार हैं,
जो मेरी नैया पार लगाते हैं।
-सौरभ जोशी