क्या माँ से बड़ा भी कोई ईश्वर है,
जिसकी ममता धरती को स्वर्ग बनाती है?
नौ मास गर्भ में रखकर,
असंख्य दुःख सह जाती है,
हर एक पीड़ा को सहकर भी,
हमें संसार दिखाती है।
अपनी ममता के आँचल में,
माँ ने हर पल पाला है,
देकर अपने हिस्से का जीवन,
मेरे जीवन को ढाला है।
ख़ुद अपना पेट काटकर,
हमें निवाला देती है,
मेरे हिस्से के काँटों को,
चुपके से चुन लेती है।
लग जाए जो चोट मुझे,
तो दर्द उसे भी होता है,
मेरी थोड़ी-सी तकलीफ़ों पर,
माँ का कोमल मन रोता है।
मेरे स्वभाव के बदलने पर भी,
वो हँसकर बलैयाँ लेती है,
मेरे अस्वस्थ होने पर,
वो पूरी रात न सोती है।
न ज्योतिष का कोई ज्ञान उसे,
फिर भी चेहरा पढ़कर मेरा,
वो दिल का हाल बता देती है।
ग्रह-नक्षत्रों की गर्दिश को,
माँ पल भर में हर लेती है,
मन की तपती हर ज्वाला को,
माँ प्रेम से शीतल कर देती है।
जब पिता से बात मनवानी हो,
मैं माँ की ओट में छुप जाता हूँ,
वो ख़ुद ताने सुनकर भी,
मेरी हर ज़िद पूरी करवाती है।
अब मन में यही सवाल उठे—
क्या माँ से बड़ा कोई ईश्वर है?
जो सहकर दुनिया के हर दर्द को,
हमें हौसला देती है।
- सौरभ जोशी