विज्ञापन

नाचे मयूर मेरे मन का

Satyapal Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नाचे मयूर मेरे मन का
        
                                                    
                            

उमडता घुमड़ता झूमता बरसता
आया मौसम सावन का ।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
तन मन को पुलकित करता
कोमल स्पर्श पुरवाईं पवन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।

बरखा रानी नींद से जागी
पड़ने लगी ठंडी फुहार ।
चारों ओर फैली हरियाली
धरती ने बदला श्रंगार ।
मन कहे उड कर छू लूं
सतरंगी धनुष नील गगन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।

पंख फैलाये उड़े गगन में
सावन की दीवानी बदरी ।
प्रीतम से मिलने की चाह में
मैं भी बैठी सजी संवरी ।
भीगे आंगन को देख बढ़े
ताप मेरे तपते तन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
-सत्यपाल सिंह
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all