नाचे मयूर मेरे मन का
उमडता घुमड़ता झूमता बरसता
आया मौसम सावन का ।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
तन मन को पुलकित करता
कोमल स्पर्श पुरवाईं पवन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
बरखा रानी नींद से जागी
पड़ने लगी ठंडी फुहार ।
चारों ओर फैली हरियाली
धरती ने बदला श्रंगार ।
मन कहे उड कर छू लूं
सतरंगी धनुष नील गगन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
पंख फैलाये उड़े गगन में
सावन की दीवानी बदरी ।
प्रीतम से मिलने की चाह में
मैं भी बैठी सजी संवरी ।
भीगे आंगन को देख बढ़े
ताप मेरे तपते तन का ।।
नाचे मयूर मेरे मन का ।।
-सत्यपाल सिंह
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