हृदय में बसे हमारे जमुना जी
वाणी पर नाम बसे हमारे
दोनों अँखियों बीच बसे कान्हा
बसे कैसे भूलेंगे कैसे उनको।
मोर मुकुट सिर सुंदर विराजे
मणि जड़ित माणिक्य
जगमग युगल ज्योति नयन
बीच बसे कैसे भूलेंगे कैसे उनको।
कुण्डल कान कपोल अति सुंदर
वचन अत्यंत मृदुल जिनके
लाल-लाल अधर बीच धरते
मुरली बसे कैसे भूलायें हम उनको।
देह में पीले वस्त्र पीताम्बर
कटि तट राजे सब
मानों चपला गगन घन बीच
बसे कैसे भूलें कैसे हम उनको।
कुंतल केश कुटिल कर टेढ़े-मेढ़े
दिव्य चितवन जिनके
तिरछी मुकुट बसे हृदय बीच
बसे कैसे भूलायें कैसे हम उनको।
सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)
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