घेरे मन तन और स्वप्न को
हिलोर लेती तरंगे वह पहली तरुणाई की
आलोकित वल्लरी सी हुई तुरन्त
घेरे मेरे अपने तन-मन
कुसुमित नवल प्रसून भव की प्रथम सुगंध
पहले पहल कुसुमाकर में लिपटे
अँखियों को असर कर गई
पहली-पहली प्रीति किरण
बुकनी हो लिप्त हुई
शून्य-सिद्धी को दीप्त करती रही
अतीव अन्तर्वेग भर
पतझड़ पत्र पर स्वर्णिम प्रभात के
मरीचि संसर्ग से आलोक
उत्कंठित तरुणाल उड़ते पतंग जैसे
सैर करते छैल-छबीले चित्त
धवन-मृदुल भ्रमर-पुँग
मुँहजोर उर चुप वैसे
अभिवन्दन गान हरेरे।
(२)
नीझर गिरते मुदिता के चारों ओर
झर-झर झरते अंतस् हर्षाम्बार से बार-बार
कुण्डलाकार कूजन-मौजों के बीच में
उट्ठान हुई लोलिता-सी
उद्वेलित कोमल भार
विशद् क्षितिज के उस पार
अनुरक्त निबद्ध चितवन
निरीह अनगढ़ में
नयन निश्छल को हुआ छवि-दर्शन
जब विवुध तुम मिले
कला को नैनों से
ज्यों मिला सौंदर्य-रूप को मोहकर
निशिपुष्पा के कुमुद
कुलिश सारंग-माल सिंगार
पवित्र-विजन अबोल सार-सृजन को
स्मरण है वह प्रात:काल
आरंभ में मयूख स्पन्द
माघमती के चितवनों में
प्रारंभ में पुलक आनंदित
चुम्बित शिशिरांत की कुसुमित वल्लरी पर
(३)
पहली पतग बालाओं की निश्शब्द ध्वनि
मोह-मिलन का मधुर गीत
पहिला स्मित मुकुल पर विवसन गात
आरंभिक बयारि के परस से
सिहरती करती रहती विहार
मधुवन में मैं खंडित-हार
शुक्तिमणि सी मैं निसङ्ग
बहुविध अनुभाव से देखती विचारती
तुम मिले अचानक
रुक गई मैं तुम्हें देखकर
खुद ही नजर अपलक सी थमी
बिखरी निगाह खिंच कर अंतस् को चकित किया
समर्पित किये प्राण इक दूसरे को
कामना से जीवन हो गया इक-दूसरे का
जो दूर थी; खिंच आई करीब
ज्यूँ हुई मैं अपनी ही नजर में
(४)
था जो नजदीक मेरा संसार
वह दूर बहुत दूर दिखा
मिली मुझमें प्रकाश-प्रतिमा सी तुम्हारी
सम्मिलित हुई उजाला सौंदर्य की मेरी
क्यों नीलाभ गगन से
बँधन में बँध कर क्यूँ रह गई
मग्न हो गये निज प्राणों में
किसलय वल्लरी भार
बन अरण्य मुकुल विटप हार
मृदृल गञ्जन चल जग के झाँकी सब
सुदर्शन नभ के भी छटा-दर्शन अखिल
मार्तण्ड अभेद्य वसुधा निसर्ग नीलाम्बरी
संदेशी मेघमाल परदेश के
प्रीति के युगांतक में परिसीमा भी खो गई
बेकली बँधी हुई है सिर्फ तुमसे
निहारने लगी फिर मैं तुम्हें
फिर अपनी पहिल धरा को
देखा उसका बदला हुआ भाव
(५)
आरंभ की पावस-मेघमाल वृतांत बनी हुई
कैसा बेगुनाही ये कालिख आकर गया लग
सुहंगम मैं देखती हुई
जैसे हो गई मैं स्तब्ध जड़
जगा जब तन का ज्ञान
तब आई याद अपने अवस्थान
हुई लज्जा से पानी-पानी
उठ चले फिर कदम दूसरी ओर
बैरागी हुई अपने आप से
बढ़ चली निश्शब्द चुपचाप
निर्वाक्य दाह उर में लिये
अंत:सार प्रीति भार
ताकते क्षणागण्य चक्षुओं से तुम मुझे
रखते बाँध कर दृष्टि में मुझे चिरकाल
अंगीकार करने के लिये स्व ही नारी रूप
नश्वर में स्वर्गीय आनंद पाने के भाव; प्रिये!
पान करने को सुधा गातों से झरता हुआ
कैसी आलस्य रहित निगाह
(६)
ज्यूँ भोर में भीगी पतझर धवल पुहुप
अपलक देखती है रश्मि-बाला को
वसुंधरा का नेह सर्वस्व अनुदान देती
गगन की अतुलनीयता को
दृगंचलों पर रख अम्बक
करता लेखन शब्दासार
अर्थों में विश्रृंखल बहता हुआ भी निश्चल
न दिया ध्यान देकर मैनैं झूमर गान पर
सब सम्मान गिरह में चली गई बंधकर
अभिप्रणयन वे निबद्ध भव के
बस हुई मैं उनकी ही
हाय! जान न सकी मैं
यथार्थ सीमा से बंधी हुई
टूटकर देखो कहाँ गिरी
गुजरा हुआ समय पुकारे
अब तन-शोला बढ़ने लगी
किशोर-कुञ्ज की अनंग-क्रीड़ा को
जैसे मिला मरुस्थल
उतराई गिरि से जैसे झरना जमीं पर
(७)
हुई पंकभारक निर्मल-स्कन्ध लांछित हुआ
अनुकंपा को अपलक नजर देखती
खुली लेकिन रक्तवर्णी रस झुलसाती ही रही
आपूर न कर सके प्राण वृत्ति कण दान से
नन्हें कदमों से तब तुम करते विहार
आशुग चलते जैसे मंद-मंद बार-बार
उर के सजे तार झन-झन करने लगे
श्वांसों से अंतर्वेग में अंदेशा करने लगा प्रवेश
खुद अपने प्रणय गीत पर
सुखदाई मंजुल सुर की माया में
हिलोरों में हिय की
गई मैं बिसर-सी
भवचक्र की पीड़ा आघात
जैसे तुम में दुर्बल धाम
परन्तु हाय!
मर्यादा का मूल्य और रूढ़ियों की परंपरा
वंश का सम्मान सद्वृत्ति और वेदित्व
को कर खंडित कहाँ आ गई।
✍🏿 सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
नवजीवन विहार से.नं. ४, विन्ध्यनगर
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)