मुद्दत हुई साक़ी ने समन्दर नहीं देखा ,
हमने तो कभी ऐसा सुख़नवर नहीं देखा !
बुझने का सबब पूछा चराग़ों से सभी ने ,
आंखों में मगर जलने का वो डर नहीं देखा !
ये साल हवा के किसी झोंके सा ही गुज़रा ,
दीवार पे लटका वो कैलन्डर नहीं देखा !
कैसे भला पैग़ाम-ए-महोब्बत उन्हें भेजें,
मुददत से कोई छत पे कबूतर नही देखा !
देखा जो नज़र भर के 'सतीश' बज़्म में उनको
शर्मा गए वो आंख उठा कर नहीं देखा !
(बहर-मफऊल/मुफाईल/मुफाईल/फ़ऊलुन)
- सतीश मलासिया'शुजालपुरी'
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