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किताब पढ़ के मुझे ख़्याल यही आया है

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            किताब पढ़ के मुझे ख़्याल यही आया है,
        
                                                    
                            
ज़हन मिरा कई किरदारों को जी आया है।

ये जब लगा कि सफर आज मुक़म्मल होगा,
हर एक बार नया मोड़ तभी आया है।

न आए दर पे वो जिनसे हमें उम्मीदें थीं,
नहीं थी जिससे कोई आस वही आया है।

गिराया है किसी ने आज पड़ोसी का घर,
निशां मेरे दरो दीवार में भी आया है।

उसे तो मिलती नहीं काम से फुरसत अपने,
मेरे करीब किसी काम से ही आया है।
- सतीश बोरकर
2 महीने पहले
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