आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

किताब पढ़ के मुझे ख़्याल यही आया है

                
                                                         
                            किताब पढ़ के मुझे ख़्याल यही आया है,
                                                                 
                            
ज़हन मिरा कई किरदारों को जी आया है।

ये जब लगा कि सफर आज मुक़म्मल होगा,
हर एक बार नया मोड़ तभी आया है।

न आए दर पे वो जिनसे हमें उम्मीदें थीं,
नहीं थी जिससे कोई आस वही आया है।

गिराया है किसी ने आज पड़ोसी का घर,
निशां मेरे दरो दीवार में भी आया है।

उसे तो मिलती नहीं काम से फुरसत अपने,
मेरे करीब किसी काम से ही आया है।
- सतीश बोरकर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर