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कभी चाक था जो जिगर सिल गया

Satish Borkar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी चाक था जो जिगर सिल गया।
        
                                                    
                            
ग़ज़ल की रफ़ू से ग़म-ए-दिल गया।

अभी फ़र्ज पूरे हुए ही नहीं,
नया एक किरदार फिर मिल गया।

उसे याद करना खता थी मेरी,
उसे भूल जाना ही मुश्किल गया।

किसी नाव में रख दिया पाँव जब,
लगा हाथ से अपने साहिल गया।

किसी नाव में रख दिया पाँव जो,
लगा हाथ से अपने साहिल गया।

मुहब्बत की पाकर छुअन ऐ सतीश,
अदावत की गर्मी में दिल खिल गया।
- सतीश बोरकर
3 घंटे पहले
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